Jumma Ki Namaz Ka Tarika in Hindi


Jumma Ki Namaz  Jumma Ki Namaz Ka Tarika in Hindi Urdu :  अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाह वबरकाताहु मेरे प्यारे भाइयों और बहनो अगर आप मेसे किसी को नमाज़ पढ़ना नहीं आता है या फिर नमाज़ की नियत करना नहीं आता हो तो आप बिलकुल भी परिसान ना हो आप हमारे वेबसाइट Duanamaz.com पर आएं और namaz ka tariak इन हिंदी उर्दू में सीखें और किसी भी इस्लामिक जानकारी चाहिए हो तो वो भी आपको इस वेबसाइट पर मिल जायगा आज के Post में हम आपलोगो को Jumma ki namaz ka tarika in hindi urdu के बारे बताएँगे|

Jumma ki namaz ka tarika 

बिस्मिल्लाह-हिरहमा-निर्रहीम

5 वक़्तों के तरह ही जुम्मा की नमाज़ भी हर मुसलमान को पढ़ना जरुरी है लेकिन जुम्मे की नमाज़ weekly नमाज़ है      यानि के हफ्ता में एक दिन तो चलिए सबसे पहले हम जुम्मा की फ़ज़ीलत के बारे में जानेगे|

Jumma Ki Fazilat

हजरत अबू हुरैरा (R.Z) से रिवायत है की रसूल अल्लाह (S.A.W) जुम्मा के बारे में बताएं है की इसमें एक वक़्त ऐसा भी है की अगर कोई मुसलमान नमाज़ बराबर लगातार पढता है तो और वो इंसान नमाज़ी उस वक़्त अल्लाह तआला से जो भी मांगता है तो अल्लाह तआला उसे वो चीज अतः कर देते है (भुखारी शरीफ हदीस नंबर: 935, मुस्लिम शरीफ हदीस नंबर:852,)

हजरत अबू हुरैरा R Z से रिवायत है की रसूलअल्लाह SAW ने इरशाद फ़रमाया है की सबसे अच्छा दिन जुमे का दिन है कियों की आज के ही दिन यानि के जुमे के ही दिन हजरत आदम अलैहिसलाम AS पैदा हुए थे और आज के ही दिन यानि जुमे के दिन वो जन्नत में गए थे और जुम्मे के ही दिन उनको जन्नत से बाहर भी आये थे इसी वजह से जुमा को मुसलमानो के लिए ख़ास दिन माना गया है|

जुमे की नमाज़ किस पर जरुरी है और किस पर नहीं

हर वो मुसलमान जो बालिग़ है जिसका उम्र (age) 18 साल से ज्यादा है समझदार और अपने शहर या मोहल्ले में रहता हो उस पर जुम्मा की नमाज़ फ़र्ज़ है औरतों और बच्चो पर जुमे की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है औरतें अपने घरों में जुम्मे के दिन जुहर की नमाज़ अदा करें इसी तरह अगर कोई इंसान 77 साल से ज्यादा उम्र (age) के है उस पर भी जुमा की नमाज़ फ़र्ज़ नहीं है अगर किसी इंसान का दिमागी हालत ख़राब है यानि वो पागल है उस पर भी जुमे की नमाज़ कोई जरुरी नहीं है|

जुमा और दूसरे नमाज़ों में फर्क किया है|

(1) जुम्मा की नमाज़ हफ्ते में एक दिन होता है जुमे के दिन और दूसरी फ़र्ज़ नमाज़ रोज daily होती है

(2) जुमा की नमाज़ को अकेले में नहीं पढ़ा जा सकता है जुमे की नमाज़ के लिए जमात जरुरी है और दूसरी नमाज़            जमात के साथ या फिर तनहा अकेले भी पढ़ सकते हैं|

(3) छोटे गाओ में जुमा की नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती है और जबकि दूसरी नमाज़ पढ़ी जा सकती है|

(4) जुमा के नमाज़ के लिए खुद्बा बहुत जरुरी होता है जबकि दूसरी नमाज़ के लिए खुद्बा जरुरी नहीं होता है|

जुमा की नमाज़ ना पढ़ने की सजा

हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर और हजरत अबू हुरैरा (R.Z) ने रसूल अल्लाह को फरमाते हुवे सुना की आप मेंबर इमाम के मुसल्ले के बगल में उस जगह जिस पर खड़े हो कर जहा पर जुमा का खुद्बा होता है उस सीढ़यों पर यह फरमा रहे थे जो इंसान या लोग जुमे की नमाज़ को जान बूझकर छोड़ देते है वो लोग खबरदार हो जाएँ अल्लाह तआला उनके दिलों पर मुहर लगा देंगे फिर वो लोग ग़ाफ़िलिन में से एक हो जायेंगे| (मुस्लिम हदीस नंबर (865)

जुमा की नमाज़ कितनी रकत है : जुमा की नमाज़ में टोटल 12 रकत है बिलकुल उसी तरह जैसे जहर की नमाज़ है बस जुमे की नमाज़ में 2 रकत फ़र्ज़ है |

जुमा की नमाज़ पढ़ने का सही तरीका

सबसे पहले 4 रकत सुन्नत इ मुवाकदा पढ़े उसके बाद खुद्बा की अज़ान और खुद्बा के बाद इमाम के साथ 2 रकत फ़र्ज़ पढ़ें 2 रकत फ़र्ज़ अदा करने के बाद 4 रकत सुन्नत इ मुवाकदा पढ़े उसके बाद 2 रकत नफल पढ़े इस तरह आपके 12 रकत आपके मुकम्मल होते है|

जुमा से जुडी दूसरे कुछ मशले

(1) जुमा की नमाज़ सिर्फ और सिर्फ जमात के साथ अदा किया जाता है|

(2) जब इमाम खुद्बा देने के लिए मिम्बर पर खड़े हो जाएँ तब उसके बाद किसी भी नमाज़ की नियत नहीं करनी     चाहिए अगर आप सुन्नत पढ़ रहे हो तो उसे जल्दी से पूरा कर लें और खुद्बा सुनें|

(3) अगर इमाम ने खुद्बा देना सुरु start कर दिया हो तो उस दौरान बात चीत करना हराम है अगर आपको खुद्बा की        आवाज़ सुनाई दे रही हो तो सुने वरना खामोस रहें|

(4) अगर कोई इंसान खुद्बा के वक़्त आपको सलाम भी करे तो उसका जवाब नहीं देना चाहिए और अगर कोई इंसान बात भी कर रहा हो तो उसे मन नहीं करना चाहिए नमाज़ ख़तम होने के बाद उसे समझाएं की खुत्बा के वक़्त आपको बात नहीं करना चाहिए|

(5) अगर किसी का जुमा की एक रकत छूट गयी हो तो वह दूसरी रकत पूरी कर के सलाम फेर दे तो वह जुमा को पाने वाला मन जायेगा|

(6) अगर कोई नमाज़ी इमाम के सलाम फेरने के बाद नमाज़ पढ़े तो उसकी जुमा की नमाज़ नहीं होगी या तो उसे दूसरे मस्जिद में जाना चाहिए या फिर जहर की क़ज़ा करे जुमा की क़ज़ा नहीं होती है|

(7) अगर बच्चे ख़ुत्बे के समय सरारत या बात कर रहे है तो उनको यातो तो ख़ुत्बे के पहले डांट या बोल सकते है या फिर ख़ुत्बे के बाद ख़ुत्बे के दौरान डांटना या बोलना जायज़ नहीं माना गया है|

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