अस्सलामु अलैकुम क्या आप जानना चाहते है की Five Pillars of Islam यानि के इस्लाम के पांच सिद्धांत क्या हैं? जिस तरह से ईमारत बनाने के लिए उसका पिलर मजबूत होना चाहिए, उसी तरह इस्लाम भी 5 pillars पर टिका हुआ है।
Wikipedia के अनुसार पूरी दुनिया में 24.9% इस्लाम की आबादी है यानि 200 crores से भी ज्यादा है जिसमे बहुत सारे मुसलमान को इस्लाम के इस्लाम के पांच सिद्धांत क्या हैं? इसके बारे में जानकारी ही नहीं है।
हेल्लो दोस्तों duanamaz.com ब्लॉग में आप सभी का वेलकम है आप इस ब्लॉग को last तक पढ़े तो आपको भी जानकारी हो जाएगा की इस्लाम धर्म के पांच सिद्धांत क्या हैं?
इस्लाम धर्म के पांच सिद्धांत
5 Pillars of Islam का मतलब ही होता है समर्पण (surrender) अपने आप को अल्लाह ता’अला के आगे पूरी तरह समर्पण कर देना ही इस्लाम है।
इस्लाम के मुताबिक हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के द्वारा बताए गए तरीकों पर चलकर के ही अमन यानी शांति प्राप्त की जा सकती है इस्लाम के नियमों के अनुसार जिंदगी गुजारने वाले को ही मुसलमान कहा जाता है।
इस्लाम में पांच बातों के बारे में कहा गया है कि इस्लाम के पांच स्तंभ (pillars) हैं इन पांचों स्तंभों में से कोई एक भी स्तंभ ढह जाए तो इस्लाम की पूरी इमारत ढह जाती है कहने का मतलब है कि जब तक कोई व्यक्ति इन पांच बातों का विश्वास और पालन ना करें तब तक उसे मुसलमान नहीं कहा जा सकता इन पर अमल करना हर मुसलमान के लिए फर्ज है।
Shahada (गवाही देना)
शहादत यानि इमान या विश्वास यह इस्लाम का सबसे पहला और इंपॉर्टेंट पिलर है
शहादत अरबी लफ्ज़ है जिसका मतलब गवाही देना, हर मुसलमान को दिल और जुबान से इकरार करना पड़ता है यानी ये गवाही देना के अल्लाह के सिवा कोई माबूद यानी कोई इबादत के लायक नही और मुहम्मद (स०अ०) अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं।
कोई इन्सान उस वक़्त तक मुसलमान या इस्लाम में दाखिल नही हो सकता जब तक ये ना मान ले के अल्लाह एक है और वही तनहा इबादत के लायक है और नबी करीम (स०अ०) उसके आखरी रसूल हैं।
ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह
नही है कोई माबूद अल्लाह के सिवा मुहम्मद (स०अ०) अल्लाह के रसूल हैं।
ये पहला कलमा है जिसको दिल और जुबान से तस्लीम करना होता है यानि मानना पढ़ना है।
Shahada Five Pillars of Islam का पहला सिद्धांत है।
Namaz (नमाज़)
हर मुसलमान के लिए दिन में 5 बार नमाज अदा करना जरूरी होता है जो लोग नमाज के बारे में नहीं जानते उन्हें बता दूं कि की इबादत का एक खास तरीका होता है जिसे लोग खाना ए काबा की ओर मुंह करके अदा करते हैं।
नमाज को अल्लाह ताला ने इसलिए लागू किया ताकि इसके जरिए अल्लाह ताला और उनके बन्दे के बिच एक माध्यम बन जाए।
सभी मुसलमान मर्द औरत पर 5 वक़्त (टाइम) की नमाज़ फ़र्ज़ की गयी है जो की इस प्रकार है:-
फज़र (Fajr) :- यह नमाज़ सुबह (Morning) सूरज निकलने से पहले पढ़ी जाती है।
दुहर (Duhur) :- यह दोपहर (Afternoon) को अदा की जाती है।
असर (Asr) :- यह दोपहर (Afternoon) के बाद पढ़ी जाती है।
मगरिब (Maghrib) :- यह शाम (Evening) को सूरज के डूबने के वक़्त पढ़ी जाती है
ईशा (Isha) :- यह देर रात्रि (Night) को सोने से पहले पढ़ी जाती है
नमाज मस्जिदों में पढ़ी जाती हैं मस्जिदों के अलावा दूसरी जगहों पर नमाज पढ़ने की इजाजत केवल उन लोगों को ही है जिनके पास कोई उचित कारण हो नमाज अदा करने से पहले अपनी शारीरिक पाक साफ़ के लिए मुसलमान वजू करते हैं जिसमें शरीर के कुछ अंगों को पानी से धोया जाता है।
नमाज इस्लाम के पांच सिद्धांत का दूसरा पिलर है
Ramadan (रमज़ान)
हर बालिक मुस्लिम को रमजान के महीने में रोजा रखना जरूरी होता है जिसमें सूर्योदय के पहले से ही खाना पीना बना होता है, जब तक कि सूर्यास्त ना हो जाए रोजे के दौरान हम उस तकलीफ का एहसास कर सकते हैं जो भूखे और गरीब लोग खाने-पीने की कमी के कारण महसूस करते हैं।
रोजे के दौरान हर बुराई से परहेज करना जरूरी होता है सिर्फ खाने पीने की चीजों का ही नहीं बल्कि शरीर के किसी भी अंग से कोई भी बुराई ना करने का नाम रोजा है जैसे की आंख से बुरा ना देखना, जुबान से बुरा ना बोलना, कान से बुरा न सुनना और किसी के लिए बुरा ना सोचना भी रोजे का हिस्सा है।
रोज़ा (5 Pillars of Islam in Hindi) का तीसरा सिद्धांत है।
Zakat (ज़कात अदा करना)
ज़कात हर मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज है। और ज़कात इस्लमिक बुनियाद का एक हिस्सा है जिसमे अगर कोई इंसान साहिबेनिसाब है तो उस पर ज़कात फर्ज है।
सरल भाषा में कहें तो जिसके भी पास 87 ग्राम सोना या 612 ग्राम चांदी या उसके बराबर कैश हो तो उसे अपनी शेविंग का ढाई परसेंट हिस्सा जकात के रूप में गरीबों को देना जरूरी होता है।
Zakat (Five Pillars of Islam) का चौथा सिद्धांत है।
हज (काबा की जियारत करना)
हज करना मुसलमान पर फर्ज है। अगर कोई मुसलमान इतनी दोलत रखता हो जिससे Hajj का खर्चा आसानी से उठा सके तो उस पर हज फर्ज हो जाता है। अगर कोई शारीरिक और आर्थिक रूप से हज करने मे सक्षम है तो उस पर हज फर्ज है।
हर आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम मुस्लिम पर हद होता है इस्लामी साल के आखिरी महीने में होता है जिसमें लोग सऊदी अरब के मक्का और मदीना की जियारत करते हैं और तमाम अरकानो को निभाते है. इस दौरान मुस्लिम एक खास सफेद कपड़ा पहनते हैं जिसे अहराम कहा जाता है।
हज के मौके पर दुनिया भर दुनियाभर के मुसलमान मक्का और मदीना में इकट्ठा होते हैं जिससे एकता की भी एक मिसाल पेश होती है हज के बारे में कहा गया है कि जिसने भी हज कर लिया वह अपने तमाम पिछले गुनाहों से मुक्त हो जाता है और अपने जीवन की एक नई शुरुआत कर सकता है।
हज इस्लाम का पाँचवा सिद्धांत (Pillar) है।
हज की शर्तें:–
मालदार होना
मुसलमान होना
आकिल(अक़लमंद) होना
बालिग़ होना
आज़ाद होना
सेहतमंद होना
रस्ते का पुर अमन होना
हुकूमत के तरफ से कोई रुकावट न होना
इस्लाम के पांच स्तंभ कौन कौन से हैं?
इस्लाम के पांच सिद्धांत ये है:
शहादा
नमाज़
रोज़ा
ज़कात
हज
इस्लाम धर्म का मूल मंत्र को क्या कहते है?
इस्लाम धर्म का मूल मंत्र 5 है जिसे 5 pillars of islam कहते है यानि (इस्लाम के पांच सिद्धांत, मूल मंत्र है) इस्लाम जो भी इन्सान इसका पालन करता है वही मुसलमान कहलाता है।
मुझे उम्मीद है की आपको मेरी यह लेख इस्लाम के पांच सिद्धांत क्या हैं (Five Pillars of Islam in Hindi) जरुर पसंद आई होगी।