Bakrid Me Qurbani Kyon Diya Jata hai | बकरीद का इतिहास हिंदी

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Bakrid me qurbani kyon diya jata hai
History of Bakrid

Bakrid Me Qurbani Kyon Diya Jata hai, Bakra eid, bakra eid 2020, बकरीद का इतिहास हिंदी, ( bakrid ) को eid ul adha भी कहा जाता है बकरीद के दिन जानवरों की क़ुरबानी दी जाती है लेकिन बहुत से लोगों को ये मालूम न होगा की आखिर जानवरों की क़ुर्बानी क्यों दिया जाता है तो चलिए जानते है Bakrid के इत्तिहास के बारे में |

बकरीद में क़ुरबानी किस पर वाजिब है पूरी जानकारी हिंदी में

बिस्मिल्लाह हिर्रहमा निर्रहीम

नाजरीन आपको ये तो मालूम ही होगा की इस्लाम में एक साल में दो ईद मनाई जाती है एक ईद और दूसरा बकरीद ( Bakrid ) दोनों में कुछ ख़ास फर्क नहीं है ईद में हम सेवई और मीठी चीज खातें है इस लिए इसे मीठी ईद भी कहा जाता है|

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और दूसरा जिसे ईद उल अजहा और बकरा ईद ( Bakrid ) भी कहते है जो ईद के तक़रीबन दो महीना दस दिन के बाद मनाया जाता है बकरीद यानि ईद उल अजहा में हर मुसलमान अपने हैसियत के मुताबिक़ बकरा या दुम्बा की क़ुरबानी देते है|

इस्लाम में बकरीद को एक बड़ा परब यानि तेहवार माना गया है जो है भी इस्लाम में एक साल में दो ईद मनाई जाती है पहला ईद है जो धर्म समाज में खुशियां और मिठास बांटने का सन्देश देता है इसी लिए ईद को मीठी ईद भी कहा जाता है|

और दूसरा बकरीद है जो ईद के दो महीने के बाद आता है जो अपने फर्ज और ईमान पर टिके रहने की सन्देश देता है बकरीद के दिन को फर्ज़े कुर्बान का दिन भी कहा जाता है |

बकरीद में क़ुरबानी क्यू करते हैं

दोस्तों ( Bakrid ) का मतलब बलिदान त्याग का परब तेहवार है bakr का मतलब बकरा बिलकुल भी नहीं होता है अरबी भासा में bakr का मतलब होता है ऊंट या फिर बड़े साइज का जानवर बकरीद को ईद उल अजहा भी कहा जाता है बकरीद के दिन जानवरों की क़ुरबानी दी जाती है जिसका असली मतलब ये हुआ की आप अपने हलाल के पैसों से अल्लाह के राह में क़ुर्बानी दें |

क़ुरबानी देने की वजह क्या है

हजरत इब्राहिम अलैहि अस्सलाम ने एक रात खवाब देखा जिनमे अल्लाह तआला ने हजरत इब्राहिम अलैहि सलाम को हुक्म दिया की वो अपनी सबसे अज़ीज़ सबसे प्यारी चीज को जिससे वो बहुत प्यार करते है उसे अल्लाह के राह में क़ुर्बान कर दें |

जब हजरत इब्राहिम अलैहि सलाम नींद से जागे तो वो सोचने लगे की आखिर मेरा सबसे प्यारा और अज़ीज़ क्या है थोड़े देर सोचने के बाद इब्राहिम अलैहि सलाम को ये अहसास हुआ की उनका सबसे प्यारा और अज़ीज़ उनका एकलौता बेटा है क्यू की वो अपने लाडले इस्माइल अलैहि सलाम से बहुत प्यार करते थे |

इब्राहिम अलैहि सलाम के लिए ये एक बहुत बड़ा इम्तिहान का वक़्त था जिसमें एक तरफ था अपने लाडले बेटे की मोहब्बत और वही दूसरी तरफ थी अल्लाह का हुक्म लेकिन इब्राहिम अलैहि अस्सलाम ने सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के हुक्म को अपने जेहन में रखा और अल्लाह जिससे राजी हो इस बात की नियत रखते हवे अपने एकलौते लाडले इस्माइल अलैहि अस्सलाम को क़ुर्बान करने का फैसला किए |

बकरे या दुम्बा का क़ुर्बानी क्यू करते है

लेकिन अल्लाह रहिमों करीम है बेसक वो सब जानता है जैसे ही इब्राहिम अलैहि सलाम अपने बेटे यानी इस्माइल अलैहि सलाम को छुरी से क़ुर्बान करने लगें उसी वक़्त अल्लाह ने फरिस्तों के सरदार जिब्रील अमिन को हुक्म दिया की जाओ इस्माइल के जगह पर एक दुम्बा को रख दो

उसके बाद हजरत जिब्रील अमिन ने हजरत इस्माइल अलैहि सलाम के जगह पर एक दुम्बे को रख दिए इस तरह इब्राहिम अलैहि अस्सलाम के हांथो से दुम्बे की पहली क़ुर्बानी हो गयी उसके बाद जिब्रील अमिन ने इब्राहिम अलैहि सलाम को खुस खबरि सुनाई की अल्लाह ने आपकी क़ुर्बानी को क़ुबूल फरमा लिया है और अल्लाह आपसे बहुत राज़ी है |

उसी दिन से क़ुर्बानी की रिवायत चली आ रही है ज्यादा तर लोग बकरीद यानी ईद उल अजहा को बकरे की क़ुरबानी देते है आइये हम आपको बताते है की क़ुर्बानी का मकसद किया होता है बेसक अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त सबका हाल जानता है और वो जानता है की जो बन्दा क़ुर्बानी दे रहा है उसके पीछे उसकी क्या नियत है |

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जब कोई अल्लाह का बन्दा अल्लाह का हुक्म मान कर अल्लाह के रज़ा के लिए क़ुर्बानी करेगा तो यक़ीनन ही वो अल्लाह की रज़ा हासिल करेगा और उसकी कुर्बानी को अल्लाह कबूल करेगा लेकिन क़ुर्बानी करने में दिखावा या तकब्बुर आ गया तो उसके सवाब से आप महरूम रह जाएंगे |

Bakrid me qurbani kis par wajib hai
History of Bakrid

 

जिस जानवर में कोई ऐब हो उसकी क़ुरबानी जायज नहीं है

बकरीद ( Bakrid ) में जिस जानवर की क़ुर्बानी दी जाए उसमे किसी तरह की कोई ऐब न हो जैसे उसके नाक कान पैर सही सलामत हो उसके जिस्म पर किसी तरह की कोई खरोच या जख्म न हो और जिस्मानी तौर पर वो कमजोर न हो |

क़ुरबानी किस पर वाजिब है |

सरियत के मुताबिक़ क़ुर्बानी हर वो औरत और मर्द पर वाजिब है जिनके पास 13000 रुपए है या फिर इसके बराबर जेवर जैसे सोना या चांदी या फिर ये तीनो चीजें हो आपको बता दें की वाजिब का मकाम फ़र्ज़ से ठीक निचे है अगर साहिबे हैसियत होते हवे भी कोई शख्स अगर क़ुरबानी नहीं करवाता तो यक़ीनन वो शख्स गुनाह का हकदार होगा |

ये जरुरी नहीं की क़ुर्बानी किसी मंहगे जानवर की कीजाए बकरीद में हर जगह के जमात खानो में क़ुर्बानी के हिस्से होते है जिसमे एक जानवर में सात शख्स हिस्सा ले सकतें है आप इस में भी हिस्सा ले सकते है |

अगर किसी शख्स ने साहिबे हैसियत होते हवे कई सालों से क़ुर्बानी नहीं दिया हो तो वो साल के बिच में सदका करके इसे अदा कर सकतें है सदका एक बार में न करके आप थोड़ा थोड़ा भी कर सकते है सदके के जरिये से ही मरहूमों के रूह तक अहले सवाब पहुंचाया जा सकता है |

क़ुर्बानी का गोस्त कितने हिस्से में तकसीम करें

क़ुर्बानी के गोस्त या आप सिरनि भी बोल सकतें है सरियत में इसे तीन हिस्से में करने का सलाह है उन तीन हिस्सों में एक हिस्से को गरीबों में बाँट दे और दूसरे हिस्से को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में बाँट दें और आखरी यानि तीसरा हिस्सा अपने घर में रखें अगर किसी का खानदान परिवार जयदा बड़ा है तो वो दो हिस्सा अपने घर पर रख सकता है लेकिन बेहतर यही है की ज्यादा से ज्यादा गरीबों में तकसीम करें |

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